बिजनेस का नया फंडा! वर्कस्‍टेशन में PG की भी सुविधा दे रहीं कंपनियां

मौजूदा समय में निवेशक इस वजह से परेशान हैं कि कहां निवेश करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सके. रीयल एस्टेट सेक्टर से भी निवेशकों ने दूरी बनाई हुई है. निवेश करने के लिए पिछले कई साल से नया ट्रेंड बना है और वह है को-वर्किंग स्पेस और को-लिविंग.

दानिश आनंद/गौरव खोसला

मौजूदा समय में निवेशक इस वजह से परेशान हैं कि कहां निवेश करके अच्छा मुनाफा कमाया जा सके. रीयल एस्टेट सेक्टर से भी निवेशकों ने दूरी बनाई हुई है. निवेश करने के लिए पिछले कई साल से नया ट्रेंड बना है और वह है को-वर्किंग स्पेस और को-लिविंग. कॉस्ट कम करने के लिए बड़ी कंपनियां को-वर्किंग का सहारा ले रही हैं, इससे यह नया उबरता मार्केट बन रहा है. आइए समझते हैं को-वर्किंग और को-लिविंग स्पेस के बारे में…

कम लागत में काम ज्‍यादा

बढ़ती लागत के कारण कंपनियां के खर्च में बढ़ोतरी हुई है और इसको कम करने के लिए को-वर्किंग का ट्रेंड तेज़ी से बढ़ रहा है. पहली तिमाही में को-वर्किंग मार्केट 25% बढ़ा है. अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस सेक्टर में निवेश कितनी तेजी से बढ़ रहा है.

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इस सर्विस की बात करें तो कर्मचारी को शांत वातावरण में बैठकर काम करने की सुविधा दी जाती है और साथ में बिजली कनेक्शन, वाई-फाई और पैंटरी सर्विस भी होती है. महज 10,000-15,000 रुपये देकर आप को-वर्किंग स्पेस बुक कर सकते हैं. निवेश की बात करें तो फिलहाल Smartworks, OYO, The Hive, Spring Board इस मार्केट में काफी एक्टिव हैं.

दिल्ली-NCR में बढ़ रही है मांग

नोएडा की सबसे बड़ी कंपनी स्मार्टवक के को-फाउंडर हर्ष बिनानी के मुताबिक पिछले 4 साल से को-वर्किंग स्पेस का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ा है. खासकर दिल्ली-NCR में इसकी डिमांड काफी तेजी से बढ़ी है.

मार्केट इसलिए भी काफी तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि निवेशकों को निवेश करने के लिए सही विकल्प नहीं मिल रहा है. ज्‍यादातर सेक्टर मंदी से जूझ रहे हैं. ऐसे में को-वर्किंग स्पेस निवेश के लिहाज से अच्छा मॉडल साबित हो रहा है. आने वाले समय में को-वर्किंग के अलावा को-लिविंग की मांग भी काफी तेजी से बढ़ रही है.

को-लिविंग का भी बढ़ रहा है ट्रेंड

निवेश के अवसर को-वर्किंग तक ही सीमित नहीं है. को-वर्किंग के साथ को-लिविंग का ट्रेंड भी तेजी से बढ़ रहा है. हाई-स्टडी के लिए लाखों स्टुडेंट्स बाहर से आते हैं और दिक्कत होती है उन्‍हें रहने और खाने-पीने की. ऐसे में कंपनियां को-लिविंग के जरिए स्टुडेंट्स को रहने और खाने-पीने की सुविधा दे रही हैं और वह भी महज 8,000 रुपये में.

यानी महज 8000 रुपये में खाना-पीना, AC कमरे, गेमिंग रूम, जैसी सहूलियत आसानी से मिल रही है. काफी कम्पनियां जैसे ऑक्सफोर्ड कैप्स एप के जरिए स्टुडेंट का पीजी में आने-जाने का समय तक रिकॉर्ड रखती हैं. ये रिकॉर्ड पेरेंट्स के साथ शेयर किया जाता है.

ऑक्सफोर्ड कैप्स की प्रियंका गेरा ने बताया कि स्टुडेंट लिविंग का मार्केट करीब 1 लाख करोड़ रुपये से भी ऊपर है और इसमें करीब 3.5 करोड़ स्टुडेंट हैं. ऐसे में फिलहाल मार्केट में सिर्फ 8-10 प्लेयर्स हैं जो स्टुडेंट लिविंग की सर्विस दे रहे हैं. टियर-2 शहरों में 50% की डिमांड है. सबसे ज्‍यादा डिमांड इंदौर, जयपुर और देहरादून से निकल रही है.

दूसरे शहरों से स्टूडेंट्स का पलायन इस मार्केट को काफी तेजी से बढ़ रहा है. यह बात तो साफ है कि जिस तरह से अर्थव्यवस्था पर मंदी के बादल छाए हुए हैं, निवेश के लिए नए ट्रेंड भी काफी तेज़ी से उबर रहे हैं. संभावना यह है कि आने वाले समय में ये ट्रेंड टियर-2 और टियर-3 जैसे शहरों में तेजी से बढ़ेगा और इनकम के साथ-साथ रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे.

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